Sunday, December 11, 2016

    कम्ज़र्फी 
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ये कम्जर्फी उसने यूँही ही ना बनायी होगी
हांथो की करीगारी है ये, इतनी संजीदगी तो उसे भी आयी होगी.
कारीगर है वो उम्दा कोई शक नहीं,
गलतियाँ जरुर शागिर्दों से करवायी होगी,
ये कम्जर्फी उसने यूँही ही ना बनायी होगी.

कुछ कुसूर हमारा भी रहा होगा,
‘सब्र कर थोडा वक्त लगेगा’ हमसे भी कहा होगा,
कमजर्फ इंसानों की जमात में,
आशुफ्ता सी जिंदगी मशरूफ है शाह और मात में,
नुक्ताचिनों को इसपर हंसी जरुर आयी होगी.
ये कम्जर्फी उसने यूँही ही ना बनायी होगी

नाकाबिल इंसान बनाना कहाँ की अक्लमंदी है,
शहर में अदीबों के आने जाने पर वैसे ही पाबंदी है,
तसव्बुफ़ से जरुर उसे कोई दिक्कत पेश आयी होगी,
यू ये कम्जर्फी उसने यूँही ही ना बनायी होगी.

गुस्ताखियों का दौर यूँ ही चलता रहेगा अकिबत तक,
मरहला – दर – मरहला सब सहते आए हम अब तक,
खामोशी से सहने की आदत यूँ आते-आते आयी होगी,
ये कम्जर्फी उसने यूँही ही ना बनायी होगी.

इस सुर्ख रात में, एक कमजर्फ इंसान है बावस्ता तुमसे,
इल्म नहीं था की यूँ मिलेगी तल्खियाँ आहिस्ता –आहिस्ता तुमसे,
कुछ – ना – कुछ तल्खियाँ तुम्हारे हिस्से भी आयी होगी
ये कम्जर्फी उसने यूँही ही ना बनायी होगी.

उमेश कुमार


कविता
कविता,
कई बार लिखी मैंने
ये बात दीगर है की तुम पढ़ न सके,
शायद शब्दों की अनुपस्थिति के कारण.

शब्द,
बहुत तलाशे मैंने,
अपने अंतःकरण के शब्दकोष से,
जिसमे मिली सिर्फ ठिठुरती हुई भावनाएं.

भावनाएं,
उमड़ती हैं शाम-दोपहर मन के समंदर में,
और यथार्थ के किनारों से टकराकर
वापस चली आती हैं मुझमे , हताश.

यथार्थ,
अक्सर वो नहीं होता,
जो तुमसे लोग कहते हैं, या फिर,
जो लोगों को रोजाना अख़बार कहते हैं,
यथार्थ सिर्फ यथार्थ होता है.

अख़बार,
कागज़ के चाँद पन्ने,
हर सुबह खबर के नाम पे हताशा बेचते,
गोया शाजिश हो खुशियों के अपहरण की.

हताश,
अब क्यूँकर होने लगे हम,
हमारे चेहरे की हताशा सदियों पुराणी है,
तुम सिर्फ देख ना सके कभी,
तुम ‘देखे या ना देखें’ की कशमकश में थे शायद.

कशमकश,
में सिर्फ तुम ही नही ये सारा ज़हां है,
घर से निकलते कहाँ को और पहुँचते कहाँ हैं,
चिट्ठियों का पता यहाँ, ठिकाना वहां है.

ठिकाना,
क्या सिर्फ उसी को कहते हैं,
जहाँ तुमने पत्थरों के घर बना लिए,
तो फिर वो क्या है जहाँ तुम्हे कोई रोज महसूस करता है,
और उड़ते जहाज़ों को देखकर, तुम्हारी चर्चाएँ होती हैं.

चर्चा,
छोड़ो भी अब क्या लेकर बैठ गए,
छेड़ोगे उसके चर्चें तो फिर से चर्चें होने लगेंगे,
कौन सा तुम्हे या मुझे चुनाव लड़ने हैं.

चुनाव,
फिर से चुनाव???
नही अभी नही, बस करो प्लीज.


उमेश कुमार

Wednesday, January 20, 2010

breakin of a bud

water cant break and so does wind & amp; sky & amp;blah.....blah....... why?? have u ever wondered? .....moreover a bud can break. When a bud breaks, it renders life to a beautiful flower. So break like a bud......if at all you are doomed to break.